प्रभु तो शरणागत वत्सल हैं-पं. सुनिधि मिश्र

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बहराइच। ग्राम सुरकुट्टी कन्दैला में आयोजित श्री मद भागवत कथा के दूसरे दिन प्रबचन करते हुए कहा कि शरणागति ही सुख है। जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में प्रभु की स्मृति बनी रहे,ऐसा निरंतर अभ्यास बनाना चाहिए। परिस्थिति कैसी भी हो लेकिन जीवन में प्रभु के ऊपर अपने विश्वास को सदैव बनाए रखना ही सुख का मूल है। जीवन की समस्याएं चाहे पर्वत जितनी बड़ी ही क्यों न हों लेकिन पूर्ण समर्पण और विश्वास के साथ यदि उस प्रभु की शरण ग्रहण की जाती है तो हमारी वह समस्या प्रभु अपने बायें हाथ की छोटी ऊँगली पर भी बड़ी सहजता से उठा लेते हैं।

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हमारी कोई समस्या हमारे लिए बहुत बड़ी हो सकती है, लेकिन उस प्रभु के लिए वह बहुत छोटी और नगण्य जैसी ही है। प्रभु तो शरणागत वत्सल हैं, प्रणतपाल हैं। जब सच्चे हृदय से पूर्ण विश्वास के साथ उस प्रभु की शरणागति जीवन में आ जाती है, तो फिर हमारे जीवन की समस्याओं का पहाड़ उस प्रभु द्वारा अवश्य उठा लिया जाता है। हमें भी ब्रजवासी जनों की भाँति जीवन की प्रत्येक समस्या के पूर्ण समाधान के लिए श्री गोवर्धन नाथ प्रभु के शरणागत होना सीखना चाहिए।

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